गिरिडीह। इजराइल से फिशरीज और एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर गांव लौटे बेंगाबाद के युवा उद्यमी सुमन कुमार ने आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए मत्स्य पालन को सफलता का बड़ा माध्यम बना दिया है। कभी आठ तालाबों से मछली पालन शुरू करने वाले सुमन आज 32 तालाबों में मछली का उत्पादन कर रहे हैं। वर्तमान में उनके यहां सालाना करीब 100 से 150 टन तक मछली का उत्पादन हो रहा है।
सुमन कुमार ने मत्स्य पालन की शुरुआत आठ तालाबों से की थी। पहले वर्ष करीब 45 से 50 टन मछली का उत्पादन हुआ। इसके बाद उन्होंने इजराइल में हासिल की गई आधुनिक तकनीकी जानकारी को अपने व्यवसाय में लागू किया। तालाबों का वैज्ञानिक प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज और संतुलित आहार के इस्तेमाल से उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में उनके तालाबों में मुख्य रूप से रहू, कतला समेत विभिन्न प्रजातियों की मछलियों का पालन किया जा रहा है।
सुमन के यहां तैयार होने वाली मछलियां गिरिडीह के अलावा झारखंड के विभिन्न जिलों और बिहार की कई मंडियों तक भेजी जाती हैं। उन्होंने बताया कि रहू और कतला मछली का थोक भाव करीब 180 से 200 रुपये प्रति किलो तक मिलता है। उत्पादन लागत और अन्य खर्च निकालने के बाद उन्हें करीब 50 से 60 प्रतिशत तक मुनाफा होता है। मत्स्य पालन से उन्हें प्रतिवर्ष करीब 12 से 15 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है।
सुमन कुमार का मत्स्य पालन व्यवसाय सिर्फ उनकी आय का जरिया नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार का माध्यम भी बन रहा है। वर्तमान में उनके केंद्र से करीब 30 से 40 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला हुआ है। स्थानीय लोग तालाबों की देखरेख, मछलियों को आहार देने, मछली पकड़ने, पैकिंग और परिवहन जैसे कार्यों से जुड़े हैं। इससे कई ग्रामीण परिवारों की आजीविका चल रही है।
सुमन का कहना है कि रोजगार की तलाश में झारखंड के युवा बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में उनका प्रयास है कि गांव में ही रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं। उन्होंने कहा कि यदि मत्स्य पालन के जरिए थोड़े से भी पलायन को रोकने में सफलता मिलती है, तो यह उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
सफलता के बाद भी सुमन कुमार का लक्ष्य यहीं रुकने का नहीं है। आने वाले वर्षों में वे सालाना 500 टन मछली उत्पादन का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार और संबंधित विभाग यदि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और जरूरी संसाधनों को गांव-गांव तक पहुंचाएं, तो झारखंड में मत्स्य पालन किसानों और युवाओं के लिए आय और रोजगार का मजबूत विकल्प बन सकता है।











