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भारत के पड़ोसी देशों में राजनीतिक तूफ़ान: नेपाल से लेकर अफगानिस्तान तक तख्तापलट और प्रदर्शन की लहर

नेपाल में वर्तमान समय में Gen-Z युवा सोशल मीडिया बैन को लेकर सड़क पर उतर आए हैं। राजधानी काठमांडू से लेकर देशभर में प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के पैतृक घर तक घेराव कर दिया। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को केवल तकनीकी कदम के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे युवाओं की अभिव्यक्ति और आजादी पर हमला माना जा रहा है। इससे नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई है और कई विशेषज्ञ इसे दक्षिण एशिया में लोकतांत्रिक संकट की नई चेतावनी मान रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में विरोध और राजनीतिक उथल-पुथल की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिससे नागरिक जीवन पर गहरा असर पड़ा है।

पड़ोसी देशों की राजनीतिक स्थिरता पर ध्यान दें तो बांग्लादेश में 2022 से ही अस्थिरता का माहौल था, जो मई 2024 में चरम पर पहुँच गया। राजधानी ढाका और अन्य शहरों में लोग अवामी लीग और उसके छात्र संगठन के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि लंबे समय से विपक्ष को दबाया जा रहा था, जिसके कारण शेख हसीना को सत्ता छोड़कर देश छोड़ना पड़ा। पाकिस्तान में मई 2023 में इमरान खान की गिरफ्तारी ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जिसमें सरकारी इमारतें जलाई गईं और इंटरनेट बंद कर दिया गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश के हालात ने यह दिखा दिया कि सत्ता संकट और लोकतांत्रिक अस्थिरता दक्षिण एशियाई देशों में तेजी से फैल सकती है।

इसके अलावा म्यामांर, श्रीलंका और अफगानिस्तान में भी हालात बेहद अस्थिर हैं। म्यामांर में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद जनता लगातार लोकतंत्र की बहाली की मांग कर रही है, जबकि श्रीलंका में 2022 के आर्थिक संकट और आंदोलन ने तत्कालीन राष्ट्रपति को देश छोड़ने पर मजबूर किया। अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान का कब्जा होने के बाद लोकतांत्रिक शासन का अंत हो गया। नेपाल में मौजूदा विरोध प्रदर्शन इस क्षेत्र की अस्थिरता का ताजा उदाहरण हैं। सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन जल्द थमेगा या दक्षिण एशियाई देशों की तरह गंभीर संकट में बदल जाएगा।

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