उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन से संत समाज में हलचल मचाने वाला बयान आया है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने संत प्रेमानंद महाराज को विद्वान और चमत्कारी मानने से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि चमत्कार वही कहलाता है जो शास्त्रों की गहरी समझ रखता हो और शास्त्रीय चर्चा में भाग ले सके। प्रेमानंद महाराज को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि यदि उनमें सामर्थ्य है तो वे उनके सामने संस्कृत का एक अक्षर उच्चारित करके या किसी श्लोक का अर्थ समझाकर दिखाएं। इतना ही नहीं, रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को बालक समान बताते हुए कहा कि वे न साधक हैं, न विद्वान और न ही चमत्कारी।
एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में रामभद्राचार्य ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर प्रेमानंद जी को चमत्कारी बताना एक भ्रामक धारणा है। उन्होंने कहा कि “लोकप्रियता क्षणभंगुर होती है, कुछ समय तक अच्छी लगती है लेकिन चमत्कार का दावा तब ही सही होता है जब कोई शास्त्र का ज्ञान रखे।” उन्होंने दोहराया कि वृंदावन और ब्रज की धरती ज्ञान और साधना की पहचान है, ऐसे में किसी को चमत्कारी बताने से पहले उसकी विद्वता परखना जरूरी है।
इसी बातचीत में उन्होंने प्रेमानंद महाराज के गांधी जी पर दिए विचारों का भी विरोध किया और गांधी को देश विभाजन के लिए जिम्मेदार बताया। रामभद्राचार्य का कहना था कि गांधी जी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रति पक्षपात दिखाया और उनकी गलतियों को अनदेखा किया, जिससे देश का बंटवारा हुआ। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में गांधी का योगदान केवल 1% था, जबकि 99% योगदान क्रांतिकारियों का रहा। इतिहास के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत पर आक्रमण ईसाई और मुसलमान शासकों ने किया, जबकि सनातन धर्मावलंबियों ने कभी आक्रमण नहीं किया। उन्होंने आक्रांताओं के अत्याचारों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की रक्षा और सनातन धर्म की प्रतिष्ठा ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।












