झारखंड आंदोलन की जन्मस्थली गिरिडीह के कुड़को गांव में पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन की खबर से गहरा सन्नाटा पसरा है। 1974 में यहीं से शोषण और अन्याय के खिलाफ उनका संघर्ष शुरू हुआ था। आज, गांव के चूल्हे नहीं जले, मंदिर सूना पड़ा है और हर चेहरा ग़मगीन है। शिबू सोरेन के परम मित्र भुनेश्वर स्वर्णकार ने नम आंखों से कहा, “मैंने सिर्फ एक नेता नहीं, अपना सच्चा दोस्त खो दिया।

झामुमो महिला मोर्चा की उपाध्यक्ष ममता ठाकुर ने याद किया कि कैसे दिशोम गुरु गांव के मंदिर में बैठकर आंदोलन की रणनीति बनाते थे। उन्होंने पीरटांड़, टुंडी और पोखरिया जैसे सीमाई इलाकों में जनजागरण की मशाल जलाई थी। आज पूरा गांव शोक में डूबा है—बच्चे चुप हैं, रसोई ठंडी है और दिलों में एक ही आवाज गूंज रही है: दिशोम गुरु का जाना सिर्फ एक शख्स का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अंत है।












