झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सारंडा जंगल क्षेत्र के लोगों के अधिकारों की रक्षा को लेकर एक सशक्त संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवता और अस्तित्व की भी लड़ाई है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन्होंने सदियों से इन जंगलों को संजोकर रखा, जिन्होंने इन्हें अपनी संस्कृति, परंपरा और जीवन का हिस्सा बनाया, उन्हें अब किसी कानून के बोझ तले दबाना न्यायसंगत नहीं होगा। सोरेन ने कहा कि सरकार अपने लोगों के हक की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगी, भले ही इसके लिए खनिज संसाधनों पर कुछ हद तक समझौता क्यों न करना पड़े।
उन्होंने आगे कहा कि कोल्हान–सारंडा के लोग आज सड़कों पर हैं और उनका पूरा समर्थन मेरे साथ है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह वही लड़ाई है जिसे मैं अदालत में भी लड़ रहा हूं। सरकार की प्राथमिक चिंता वहीं के लोगों के अस्तित्व, अधिकार और गरिमा की रक्षा है। सोरेन ने बताया कि राज्य सरकार वंशानुगत विवादों को सुलझाने और स्थानीय समुदायों के बीच आपसी समझ को मजबूत करने पर काम कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्होंने जंगलों को जन्म दिया और पीढ़ियों तक उसकी रक्षा की, उन्हें आज किसी नए नियम या नीति के कारण परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आदिवासियों को अब नियमों में बांधकर सताने की प्रवृत्ति को बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि यह लड़ाई केवल सारंडा के लोगों की नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की आत्मा की लड़ाई है। सरकार मानवीय दृष्टिकोण से इस मुद्दे को देख रही है और क्षेत्रवासियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत में मजबूती से अपनी बात रखेगी। सोरेन ने साफ कहा कि जब तक इन मानवीय पहलुओं पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक सरकार न्यायालय के किसी भी ऐसे निर्णय को स्वीकार नहीं करेगी, जो जनता के मूल अधिकारों के खिलाफ हो।












