शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर मातृत्व का स्नेह बरसाती हैं और उनकी पूजा करने से संतान सुख, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। मां की गोद में बाल स्कंद विराजमान रहते हैं और स्वयं वे कमल के आसन पर बैठी रहती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। मां का वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। विद्वानों का मानना है कि मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करने से जीवन की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और नकारात्मक शक्तियां दूर होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पूजा के दौरान भक्त मां को कमल का फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं और “ॐ देवी स्कंदमातायै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
मां स्कंदमाता को केले का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है और पीले रंग का वस्त्र पहनकर पूजा करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आध्यात्मिक गुरु पंडित कमलापति त्रिपाठी के अनुसार, मां स्कंदमाता की आराधना से संतान संबंधी समस्याएं दूर होती हैं और माता-पिता व संतान के बीच प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। दुर्गासप्तशती का पाठ और आरती करने से जीवन की कठिनाइयों का अंत होता है और परिवार में सुख-शांति का वातावरण स्थापित होता है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर मां स्कंदमाता की पूजा भक्तों को न केवल सांसारिक सुख देती है बल्कि आध्यात्मिक मार्ग पर भी आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है।












