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सुनामी से पहले की सच्चाई: कैसे काम करता है वॉर्निंग सिस्टम?”

समुद्र शांत था… आकाश नीला… लहरें हल्की-सी सरसराती हुईं… लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे प्रशांत क्षेत्र की धड़कनों को थाम लिया। रूस के कमचटका प्रायद्वीप के तट पर बुधवार को 8.8 तीव्रता का भीषण भूकंप आया। और इसके साथ ही सुनामी की आशंका ने अमेरिका, जापान, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, अलास्का और हवाई जैसे देशों में डर की लहर दौड़ा दी। कई क्षेत्रों में समुद्र की विशाल लहरें किनारे की ओर बढ़ने लगीं। यह केवल एक आपदा नहीं थी, यह एक चेतावनी थी – समय से पहले सचेत हो जाने की, विज्ञान और सिस्टम पर
“सुनामी” शब्द सुनते ही आंखों के सामने मौत का समंदर तैरने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द जापान से आया है? ‘सु’ यानी ‘बंदरगाह’ और ‘नामी’ यानी ‘लहरें’ – यानी बंदरगाह पर टकराती विनाशकारी लहरें। सुनामी सामान्य समुद्री लहरों से बिल्कुल अलग होती है। इसकी तरंगें 500 किलोमीटर तक लंबी हो सकती हैं और इसकी अवधि 10 मिनट से लेकर दो घंटे तक की हो सकती है। जब समुद्र के नीचे भूकंप आता है, तो इसकी ऊर्जा पानी में ट्रांसफर होकर लहरों के रूप में समुद्री किनारे की ओर बढ़ती है – और यही है सुनामी।

जैसे ही समुद्र में तेज भूकंप आता है, सुनामी अलर्ट सिस्टम एक्टिव हो जाता है। लेकिन सिर्फ भूकंप से ही सुनामी की पुष्टि नहीं होती। गहराई, स्थान और ऊर्जा की दिशा का आकलन किया जाता है। प्रशांत महासागर के लिए अलर्ट अमेरिका की NOAA एजेंसी देती है जबकि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत, जापान और इंडोनेशिया जैसे देश निगरानी करते हैं। अधिकांश आधुनिक सिस्टम अब एक घंटे पहले तक चेतावनी दे सकते हैं, जिससे जान-माल की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें।

अब दुनिया केवल अनुमान पर नहीं चल रही। अमेरिका की NOAA ने 1965 में अंतरराष्ट्रीय चेतावनी प्रणाली (TWS) स्थापित की थी। अब इसका आधुनिक स्वरूप DART (Deep Ocean Assessment and Reporting of Tsunami) है। इसमें समुद्र की गहराइयों में Bottom Pressure Recorder (BPR) लगाए गए हैं जो पानी के दबाव में मामूली बदलाव को भी पकड़ लेते हैं। इन डेटा को सेटेलाइट के जरिए Tsunami Warning Centers तक भेजा जाता है, जहां अल्गोरिदम इनका विश्लेषण करता है और तय करता है कि कहां, कब और कितनी ऊंचाई की लहरें आ सकती हैं।

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