भारतीय जनता पार्टी की झारखंड प्रदेश इकाई ने गुरुवार को राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर सवाल उठाए। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने रांची स्थित प्रदेश कार्यालय में एक प्रेस वार्ता में शहर में प्रस्तावित एक हजार करोड़ की लागत वाले मेडिकल कॉलेज “रिम्स-2” प्रोजेक्ट की बजाय जिलों में जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की।
भाजपा प्रवक्ता ने झारखंड उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी का उल्लेख करते हुए बताया कि रिम्स में डॉक्टरों, प्रोफेसरों, नर्सों और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भारी कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार स्थायी नियुक्तियों से बचते हुए आउटसोर्सिंग का रास्ता अपना रही है, जो न केवल अव्यवस्था को जन्म देती है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 की मूल आत्मा का भी उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज रिम्स में जरूरी उपकरण, जैसे एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, और सीटी स्कैन मशीनें लंबे समय से खराब पड़ी हैं। यहां तक कि मरीजों को दी जाने वाली बुनियादी दवाइयों और सीरिंज तक की भारी कमी है। बावजूद इसके, सरकार का ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की बजाय, केवल नई-नई इमारतें बनाने पर केंद्रित है।
कैग रिपोर्ट का हवाला देते हुए भाजपा नेता साह ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर बताया कि रिम्स में कभी किसी बच्चे की लिफ्ट में फंसने से मौत हो जाती है तो कभी कोई मरीज अस्पताल परिसर में ही दम तोड़ देता है। ये घटनाएं बताती हैं कि रिम्स न डॉक्टरों के लिए सुरक्षित है, न ही मरीजों के लिए।
रिम्स-2 की घोषणा पर सवाल खड़ा करते हुए अजय साह ने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकता जनस्वास्थ्य नहीं, बल्कि हजारों करोड़ की इमारत बनवाकर कमीशनखोरी करनी है। उन्होंने इस परियोजना को संभावित ‘टेंडर घोटाले’ की रूपरेखा बताया। उनका कहना था कि जब खरसावाँ मेडिकल कॉलेज 13 वर्षों से अधूरा पड़ा है, कोडरमा का अस्पताल अधर में है, तब सरकार का ध्यान इन अस्पतालों के पूर्ण निर्माण की बजाय नई इमारतों की ओर क्यों है, यह सरकार की मंशा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
साह ने सुझाव दिया कि रांची में एक ही हजार करोड़ रुपए का अस्पताल बनाने की बजाय, राज्य के पांच प्रमंडलों में दो-दो सौ करोड़ रुपए की लागत से पांच अस्पताल खोले जा सकते हैं। इसी बजट में, सरकार प्रत्येक जिले में 40 करोड़ रुपए की लागत से 24 आधुनिक अस्पताल स्थापित कर सकती है। ग्रामीण इलाकों में अस्पताल खोलने से वहां की अर्थव्यवस्था बदल जाएगी, लोकल लोगों को रोजगार मिलेगा और रांची रिम्स पर भार भी कम होगा।
–आईएएनएस
एसएनसी/एकेजे
‘सिर्फ बिल्डिंग मत बनाइए, अस्पतालों की सेहत सुधारिए’, झारखंड की हेमंत सरकार को भाजपा की नसीहत
भारतीय जनता पार्टी की झारखंड प्रदेश इकाई ने गुरुवार को राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर सवाल उठाए। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने रांची स्थित प्रदेश कार्यालय में एक प्रेस वार्ता में शहर में प्रस्तावित एक हजार करोड़ की लागत वाले मेडिकल कॉलेज “रिम्स-2” प्रोजेक्ट की बजाय जिलों में जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की।
भाजपा प्रवक्ता ने झारखंड उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी का उल्लेख करते हुए बताया कि रिम्स में डॉक्टरों, प्रोफेसरों, नर्सों और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भारी कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार स्थायी नियुक्तियों से बचते हुए आउटसोर्सिंग का रास्ता अपना रही है, जो न केवल अव्यवस्था को जन्म देती है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 की मूल आत्मा का भी उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज रिम्स में जरूरी उपकरण, जैसे एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, और सीटी स्कैन मशीनें लंबे समय से खराब पड़ी हैं। यहां तक कि मरीजों को दी जाने वाली बुनियादी दवाइयों और सीरिंज तक की भारी कमी है। बावजूद इसके, सरकार का ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की बजाय, केवल नई-नई इमारतें बनाने पर केंद्रित है।
कैग रिपोर्ट का हवाला देते हुए भाजपा नेता साह ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर बताया कि रिम्स में कभी किसी बच्चे की लिफ्ट में फंसने से मौत हो जाती है तो कभी कोई मरीज अस्पताल परिसर में ही दम तोड़ देता है। ये घटनाएं बताती हैं कि रिम्स न डॉक्टरों के लिए सुरक्षित है, न ही मरीजों के लिए।
रिम्स-2 की घोषणा पर सवाल खड़ा करते हुए अजय साह ने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकता जनस्वास्थ्य नहीं, बल्कि हजारों करोड़ की इमारत बनवाकर कमीशनखोरी करनी है। उन्होंने इस परियोजना को संभावित ‘टेंडर घोटाले’ की रूपरेखा बताया। उनका कहना था कि जब खरसावाँ मेडिकल कॉलेज 13 वर्षों से अधूरा पड़ा है, कोडरमा का अस्पताल अधर में है, तब सरकार का ध्यान इन अस्पतालों के पूर्ण निर्माण की बजाय नई इमारतों की ओर क्यों है, यह सरकार की मंशा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
साह ने सुझाव दिया कि रांची में एक ही हजार करोड़ रुपए का अस्पताल बनाने की बजाय, राज्य के पांच प्रमंडलों में दो-दो सौ करोड़ रुपए की लागत से पांच अस्पताल खोले जा सकते हैं। इसी बजट में, सरकार प्रत्येक जिले में 40 करोड़ रुपए की लागत से 24 आधुनिक अस्पताल स्थापित कर सकती है। ग्रामीण इलाकों में अस्पताल खोलने से वहां की अर्थव्यवस्था बदल जाएगी, लोकल लोगों को रोजगार मिलेगा और रांची रिम्स पर भार भी कम होगा।
–आईएएनएस
एसएनसी/एकेजे
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