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बंजर जमीन पर मेहनत की मिठास: बेंगाबाद की महिलाएं गाजर की खेती से आत्मनिर्भर, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती से बढ़ी आमदनी

गिरिडीह कभी घरों तक सीमित रहने वाली बेंगाबाद प्रखंड की महिलाएं आज बंजर कही जाने वाली ज़मीन पर गाजर की फसल लहलहाकर न सिर्फ अपनी पहचान बना रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी पेश कर रही हैं। बेंगाबाद प्रखंड के मोतीलेदा पंचायत में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ी महिला कृषकों ने बड़े पैमाने पर गाजर की खेती कर अपनी आजीविका में उल्लेखनीय सुधार किया है।

मोतीलेदा में पहली बार लगभग 4 से 5 एकड़ भूमि पर महिला कृषकों द्वारा गाजर की खेती की जा रही है। इस खेती में गांव की लगभग दो दर्जन महिलाएं शामिल हैं, जो अपने-अपने खेतों में आधुनिक तकनीक और जैविक विधि से खेती कर रही हैं। महिलाओं की मेहनत से पहले बंजर पड़ी ज़मीन आज गाजर की हरी-भरी फसल से आच्छादित हो गई है।

बताया गया कि बेंगाबाद जेएसएलपीएस द्वारा इन महिलाओं को गाजर की उन्नत खेती का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण से पहले भी महिलाएं गाजर उगाती थीं, लेकिन पारंपरिक तरीकों से उत्पादन सीमित रहता था। प्रशिक्षण के बाद इस वर्ष कियारी और बेड पद्धति अपनाकर खेती की गई, जिससे उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगले वर्ष और भी बड़े पैमाने पर गाजर की खेती करने का लक्ष्य तय किया गया है।

खेती में जुटी महिला कृषक आशा वर्मा, कविता कुमारी, लक्ष्मी कुमारी, बिनती देवी और सुनीता देवी ने बताया कि वे पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं। गाजर के साथ-साथ मटर, छीमी, गोभी सहित अन्य सब्जियों की भी खेती की जाती है। महिलाओं ने बताया कि अब जैविक विधि से खेती की जा रही है, जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता। इससे उत्पादन बढ़ा है और सब्जियों की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है।

महिला कृषकों के अनुसार, एक-एक महिला लगभग 15 से 20 डिसमिल भूमि पर खेती करती हैं। 10 डिसमिल में गाजर की खेती से 6 से 7 क्विंटल तक उत्पादन होता है, जिससे करीब 15 से 20 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है।

वहीं एसएचजी से जुड़े किसान कोलेश्वर वर्मा और बिनोद वर्मा ने बताया कि इस वर्ष कुल मिलाकर करीब 5 एकड़ भूमि पर गाजर की खेती की जा रही है। प्रति एकड़ लगभग 65 क्विंटल उत्पादन होता है, जिससे करीब 2 लाख रुपये तक की आय होती है। गाजर की खेती में प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपये का खर्च आता है।

हालांकि किसानों ने सिंचाई की समस्या को लेकर चिंता भी जताई। उनका कहना है कि खेतों तक बिजली की व्यवस्था नहीं होने के कारण डीजल पंप से सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। यदि खेतों तक बिजली की सुविधा मिल जाए तो कम खर्च में खेती संभव हो सकेगी।

कुल मिलाकर मोतीलेदा की महिला कृषक अपनी मेहनत, प्रशिक्षण और नए तकनीकों के सहारे न सिर्फ अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल भी कायम कर रही हैं।

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