नई दिल्ली, 12 सितंबर 2025। भारत की प्राचीन पांडुलिपियां केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली सभ्यता, ज्ञान और परंपराओं का जीवंत प्रतीक हैं। इन पांडुलिपियों में विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, साहित्य और दर्शन का वह अनमोल खजाना छिपा है जिसने सदियों तक मानवता का मार्गदर्शन किया है। अब इन बहुमूल्य धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल की है। देशभर की पांडुलिपियों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जाएगा, जिससे भारत की समृद्ध संस्कृति और ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी।
डिजिटलीकरण की इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समय और परिस्थितियों के कारण नष्ट हो रही प्राचीन पांडुलिपियां हमेशा के लिए सुरक्षित रह सकें। कागज, ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखी गई अनेक पांडुलिपियां अब नाजुक स्थिति में हैं, जिन्हें संरक्षित करना अत्यावश्यक है। डिजिटल तकनीक न केवल इन्हें सुरक्षित रखेगी, बल्कि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम जनता के लिए इनका अध्ययन करना भी आसान बना देगी। इसके माध्यम से संस्कृत, पाली, प्राकृत और तमिल जैसी प्राचीन भाषाओं में लिखी गई दुर्लभ कृतियां अब किसी भी व्यक्ति के लिए केवल एक क्लिक की दूरी पर उपलब्ध होंगी।
यह प्रयास भारत को विश्व के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करेगा जो अपनी सांस्कृतिक धरोहर को आधुनिक तकनीक के सहारे वैश्विक स्तर पर साझा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल स्वरूप में पांडुलिपियों का संग्रहालय तैयार होने से न केवल भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण होगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की बौद्धिक विरासत का सम्मान बढ़ेगा। यह पहल “डिजिटल इंडिया” मिशन और “सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता” के संकल्प को भी सशक्त बनाएगी। इसके साथ ही, यह शोध और नवाचार को नई दिशा देगी, क्योंकि डिजिटल रूप में उपलब्ध पांडुलिपियां आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगी।
विद्वानों का कहना है कि यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ज्ञान-पुल का काम करेगा। अब युवा वर्ग आसानी से इन दुर्लभ पांडुलिपियों तक पहुँच पाएगा और भारत की बौद्धिक विरासत को समझ सकेगा। साथ ही, इस परियोजना से भारतीय संस्कृति को एक वैश्विक पहचान मिलेगी, जो भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को भी मजबूत बनाएगी। प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण वास्तव में अतीत और भविष्य को जोड़ने वाली वह कड़ी है, जो भारत को सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से और अधिक सशक्त बनाएगी।












