नई दिल्ली। भारत की समृद्ध पांडुलिपि धरोहर को संरक्षित, डिजिटाइज और विश्व स्तर पर साझा करने के लिए संस्कृति मंत्रालय 11 सितंबर 2025 से नई राष्ट्रीय पहल ‘ज्ञान भारतम्’ की शुरुआत करने जा रहा है। इस अवसर पर 11 से 13 सितंबर तक दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित होने वाले पहले ज्ञान भारतम् अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।
संस्कृति सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने बताया कि इस सम्मेलन में भारत और विदेशों से आए हुए 1,100 से अधिक विद्वान, विशेषज्ञ, संस्थान और सांस्कृतिक कार्यकर्ता शामिल होंगे। तीन दिवसीय आयोजन के दौरान आठ कार्य समूह विभिन्न विषयों—जैसे लिपि-पठन, दस्तावेजीकरण, डिजिटाइजेशन, संरक्षण और कानूनी ढांचे—पर गहन विचार-विमर्श करेंगे। प्रधानमंत्री 12 सितंबर को कार्य समूहों की प्रस्तुतियाँ सुनेंगे और उसके बाद सम्मेलन को संबोधित करेंगे, जबकि समापन सत्र 13 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में होगा।
‘ज्ञान भारतम्’—संस्कृति का नवाचारपूर्ण मिशन
संस्कृति मंत्रालय का यह मिशन भारत की पांडुलिपि धरोहर को पुनर्जीवित करने का व्यापक ढांचा प्रस्तुत करता है। इसके तहत देशभर में पांडुलिपियों की पहचान और सूचीकरण, क्षतिग्रस्त ग्रंथों का संरक्षण व पुनर्स्थापन, एआई-संचालित तकनीकों के जरिए बड़े पैमाने पर डिजिटाइजेशन और एक राष्ट्रीय डिजिटल रिपॉजिटरी का निर्माण किया जाएगा। साथ ही दुर्लभ पांडुलिपियों के शोध, अनुवाद और प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाएगा। विद्वानों और संरक्षकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम तथा आम जनता की भागीदारी को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ भी इसमें शामिल हैं।
वैश्विक साझेदारी और शिक्षा में समावेशन
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस पहल को सफल बनाने के लिए पुस्तकालयों, धार्मिक संस्थानों और निजी संरक्षकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। ‘ज्ञान भारतम्’ का उद्देश्य न केवल पांडुलिपियों को भविष्य की पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना है बल्कि उनमें निहित ज्ञान को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझा करना भी है। यह पहल प्रधानमंत्री के विकसित भारत 2047 और विश्वगुरु भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने वाला कदम मानी जा रही है।
तकनीकी नवाचार पर जोर
श्री अग्रवाल ने जानकारी दी कि ज्ञान-सेतु एआई इनोवेशन चैलेंज में अब तक 40 से अधिक प्रविष्टियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। इनमें से चुने गए नवाचारों की प्रस्तुति सम्मेलन के दौरान की जाएगी। उनका मानना है कि तकनीक और परंपरा का यह संगम भारत की ज्ञान-परंपरा को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाएगा।












