काठमांडू की सड़कों पर आजकल वही सन्नाटा पसरा है, जो आमतौर पर जून की छुट्टियों में कॉलेज लाइब्रेरी में देखा जाता है। फर्क बस इतना है कि यहां किताबें नहीं, बल्कि टैंक घूम रहे हैं। सरकार ने जनता को समझाने की बजाय सीधे इस्तीफा दे दिया – जैसे कोई कॉलेज स्टूडेंट असाइनमेंट जमा करने की बजाय “सर, नेटवर्क नहीं था” वाला मेल लिख देता है। त्रिभुवन एयरपोर्ट बंद है, फ्लाइट्स कैंसिल हैं और यात्रियों के चेहरे पर वही निराशा है जैसी मुफ़्त Wi-Fi का पासवर्ड गलत निकलने पर होती है।
जेलब्रेक की कहानी तो और भी फ़िल्मी है। महोत्तरी, ललितपुर और कैलाली जेलों से हज़ारों कैदी ऐसे निकले जैसे ब्लैक फ्राइडे सेल में जनता गेट पर टूट पड़ती है। किसी ने गेट तोड़ा, किसी ने दीवार गिराई और किसी ने नेता को ही “VIP पास” समझकर बाहर निकाल लिया। अब नेपाल में हालात यह हैं कि सड़क पर आपको यह समझना मुश्किल होगा कि सामने से आ रहा इंसान कैदी है, प्रदर्शनकारी है या “कर्फ्यू-सेल्फी” लेने आया कोई टूरिस्ट।
सेना ने जिम्मेदारी संभाल ली है और अब हर 10 मीटर पर हेलमेटधारी जवान खड़े हैं। लेकिन व्यंग्य यह है कि जिस सरकार पर जनता ने भरोसा नहीं किया, वही जनता अब सेना से उम्मीद कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी नेपाल को शांति की अपील की, मगर नेपाल के आम लोग शायद सोच रहे होंगे – “सर, यहां शांति की बात करना वैसा ही है जैसे शादी में डीजे बंद करवाने की रिक्वेस्ट करना।” कुल मिलाकर नेपाल की राजनीति अभी Netflix की डार्क कॉमेडी सीरीज़ से भी ज्यादा सस्पेंसफुल और थ्रिलिंग हो चुकी है।












