अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब भारतीय रिज़र्व बैंक के पास नोट छापने की मशीन है, तो वह अनगिनत नोट क्यों नहीं छापता और जनता में क्यों नहीं बांट देता? अगर ऐसा हो जाए तो क्या हर कोई अमीर हो जाएगा? सच यह है कि अर्थव्यवस्था केवल नोटों पर नहीं टिकी होती, बल्कि उत्पादन, सेवाओं और संसाधनों पर आधारित होती है। अगर बिना वजह नोट छापकर बाजार में डाल दिए जाएं, तो वस्तुओं की उपलब्धता उतनी नहीं बढ़ती, जितनी मुद्रा बढ़ती है। नतीजा होता है महंगाई का विस्फोट यानी हाइपर इन्फ्लेशन, जिसमें पैसे की कीमत गिर जाती है और आम आदमी की जेब से एक रोटी खरीदने के लिए भी हजारों-लाखों रुपये खर्च होने लगते हैं।
दुनिया में कई देश इस भूल की भारी कीमत चुका चुके हैं। अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे इसका बड़ा उदाहरण है। घाटे को पूरा करने और जनता को खुश करने के लिए वहां की सरकार ने लगातार नोट छापे। कुछ साल बाद स्थिति यह हो गई कि 100 ट्रिलियन जिम्बाब्वे डॉलर का नोट छापा गया, लेकिन उससे एक ब्रेड भी नहीं खरीदी जा सकती थी। महंगाई इतनी बढ़ी कि लोगों के पास नोटों के पहाड़ तो थे, लेकिन उनका कोई मूल्य नहीं रहा। अंततः जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई और वहां विदेशी करेंसी यानी अमेरिकी डॉलर का सहारा लेना पड़ा।
ऐसा ही हाल वेनेजुएला का हुआ। कभी तेल निर्यात पर अमीर माने जाने वाले इस देश ने 2014 के बाद आर्थिक संकट से निकलने के लिए बड़े पैमाने पर नोट छापे। नतीजा यह हुआ कि बाजार में मुद्रा की आपूर्ति वस्तुओं और सेवाओं से कई गुना ज्यादा हो गई। 2018 तक हालत यह हो गई कि वहां की महंगाई दर 10,00,000% से भी ऊपर पहुंच गई। सरकार को बार-बार नोटों से शून्य हटाने पड़े और करोड़ों लोग भूखों मरने की कगार पर पहुंच गए। यही कारण है कि भारत सहित कोई भी समझदार देश बेहिसाब नोट नहीं छाप सकता, क्योंकि ऐसा करना गरीबी मिटाने का उपाय नहीं, बल्कि पूरे देश को बर्बादी की ओर धकेलने का रास्ता है।












