गिरिडीह, 06 अगस्त 2025 — झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दिवंगत दिशोम गुरू शिबू सोरेन को मरणोपरांत भारत रत्न देने की पुरजोर मांग की है। पार्टी के गिरिडीह प्रवक्ता कृष्ण मुरारी शर्मा ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले समाज सुधारक भी थे। उन्होंने कहा कि गुरूजी को उनके जीवनकाल में ही यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिल जाना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने झारखंड के गरीब, शोषित और वंचित वर्ग के लिए जिस प्रकार संघर्ष किया, वह अतुलनीय है। शर्मा ने भावुक स्वर में कहा, “गुरूजी की सोच और संघर्ष ने झारखंड की आत्मा को एक दिशा दी, उन्होंने हर उस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जिससे आदिवासी और दलित समाज जूझता रहा।”
शर्मा ने बताया कि शिबू सोरेन ने उस दौर में लड़ाई शुरू की, जब महाजनी प्रथा और जमींदारी अत्याचार झारखंड के गरीबों को जकड़ कर रखे हुए थे। महाजन, गरीब किसानों की जमीनें केवल चंद पैसों में “कठकेवाला” करवा लेते थे और फिर समय पर कर्ज नहीं चुकाने पर उनकी जमीनें हड़प लेते थे। ऐसे में दिशोम गुरू ने “धनकटनी आंदोलन” चलाया — जिसमें उन्होंने एलान किया कि “जिसका खेत, उसकी फसल।” उन्होंने महाजनों द्वारा रोपी गई फसलें कटवाकर गरीब किसानों को लौटा दीं। यह आंदोलन न केवल जमीन के अधिकार की लड़ाई थी, बल्कि यह एक क्रांति थी जिसने झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक सोच को बदल दिया।
केवल महाजनी प्रथा ही नहीं, अशिक्षा और नशा के खिलाफ भी गुरूजी ने जनआंदोलन छेड़ा। उन्होंने गांव-गांव जाकर गरीब बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया, लालटेन बांटे और कहा, “पढ़ना जरूरी है।” इसी तरह हड़िया दारू जैसे पारंपरिक नशों के खिलाफ उन्होंने विशेष रूप से आदिवासी समाज को जागरूक किया और उन्हें जीवन में शिक्षा और स्वावलंबन की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया। कृष्ण मुरारी शर्मा ने कहा कि गुरूजी का संघर्ष केवल आदिवासियों तक सीमित नहीं था; उन्होंने दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और हर शोषित वर्ग की आवाज बनकर समाज में नई चेतना जगाई।
गौरतलब है कि शिबू सोरेन ने झारखंड अलग राज्य आंदोलन में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई और 2000 में झारखंड के गठन के साथ उनके संघर्ष को एक बड़ी जीत मिली। वे आठ बार लोकसभा सांसद, तीन बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे। उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था, जो अब इतिहास में दर्ज हो गया है। 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के बाद पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई। झामुमो ने केंद्र सरकार से मांग की है कि दिशोम गुरू शिबू सोरेन को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाए, क्योंकि वे इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं।












