झारखंड की धरती इन दिनों भीगी हुई है, लेकिन इस बार सावन की यह रिमझिम कोई राहत नहीं, बल्कि खतरे की घंटी बनती जा रही है। आम आदमी को ठंडक देने वाली बूंदें अब चिंता और चुनौती का कारण बन चुकी हैं। मौसम विभाग ने पूरे राज्य के लिए 4 अगस्त तक यलो अलर्ट जारी किया है। लेकिन क्या ये सिर्फ बारिश का मामला है या कुछ और भी छुपा है इस चेतावनी में? तेज हवाएं, वज्रपात और भारी बारिश—क्या हम एक और प्राकृतिक आपदा की ओर बढ़ रहे हैं?
1 जून से 31 जुलाई तक, झारखंड में अब तक 760.7 मिमी बारिश दर्ज की गई है—जो कि सामान्य 508.2 मिमी से लगभग 50% अधिक है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है, यह उस असंतुलन की चेतावनी है जो जलवायु में तेजी से बढ़ रहा है। झारखंड के उत्तरी-पूर्वी जिलों—देवघर, दुमका, गिरिडीह, गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़ और साहेबगंज—में 1 अगस्त को भारी बारिश की आशंका जताई गई है।
इस बार की चेतावनी सिर्फ बारिश तक सीमित नहीं है। मौसम विभाग के अनुसार, राज्य के कई हिस्सों में 30-40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं और वज्रपात की संभावना भी बनी हुई है। ये सिर्फ कागजी अलर्ट नहीं हैं—हर साल सैकड़ों जानें वज्रपात के चलते जाती हैं, खासकर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में, जहां सूचना का अभाव और प्रशासनिक लापरवाही जानलेवा साबित होती है।
जहां राज्य के कई हिस्से बारिश से लबालब हैं, वहीं कुछ जिले गोड्डा और पाकुड़ अब भी सामान्य से कम बारिश के संकट में हैं। गोड्डा में 15% कम और पाकुड़ में भी 15% कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं, पुटकी (धनबाद) में सबसे अधिक 140 मिमी बारिश दर्ज की गई। यह विषमता आने वाले कृषि सीजन को गहरे संकट में डाल सकती है—कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा। रांची में सामान्य से 87% अधिक बारिश हुई है – क्या वहां के जल निकासी सिस्टम इस दबाव को झेल पाएंगे? या फिर हर बार की तरह, बारिश के साथ शासन की असफलताएं भी बह जाएंगी?












