सोचिए अगर कोई आपसे कहे कि काशी, जिसे मोक्ष की नगरी कहा जाता है, वह कभी श्रापित थी। जी हां, इंटरनेट पर वायरल हो रहा एक वीडियो लोगों के बीच इस सवाल को जन्म दे रहा है — क्या भगवान शंकर ने काशी को श्राप दिया था? और अगर हां, तो क्या उसी के साथ वरदान भी जुड़ा हुआ था? यह कोई साधारण कहानी नहीं, बल्कि धर्म, आस्था और मोक्ष के रहस्यों से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग है, जो हजारों वर्षों से सनातन परंपरा की आत्मा बनकर जीवित है।
वीडियो में दावा किया जा रहा है कि एक बार भगवान शिव माता पार्वती के साथ काशी के घाट पर स्नान कर रहे थे। उसी दौरान शिवजी के मस्तक की मणि और पार्वती माता के कान का कुंडल जल में गिर गया। काफी प्रयासों के बाद भी जब यह बहुमूल्य वस्तुएं नहीं मिलीं, तो भगवान शिव आक्रोशित हो उठे। उन्होंने काशी को श्राप दे डाला — “यह भूमि अब श्मशान बन जाएगी।” यह श्राप सुनकर तीनों लोकों में हलचल मच गई।
भगवान विष्णु को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कछुए का रूप धारण किया और गहरे जल में जाकर मणि व कुंडल खोज निकाले। वे तुरंत भगवान शिव के पास पहुंचे और उन्हें वह लौटा दिए। लेकिन समस्या यह थी कि श्रापित वाणी को वापस नहीं लिया जा सकता था। भगवान विष्णु ने शिवजी से निवेदन किया कि “प्रभु, आपने काशी को जो श्राप दिया है, उससे यहां कोई नहीं आएगा।” इस पर भगवान शिव ने जो कहा, वह कभी न मिटने वाला वरदान बन गया।
भगवान शिव ने कहा — “मेरे मुख से निकली वाणी वापस नहीं हो सकती, लेकिन मैं इसे वरदान में बदलता हूं। अब जो भी इस पावन भूमि पर अपनी अंतिम सांस लेगा या जिसकी चिता यहां जलेगी, उसे सीधा मोक्ष प्राप्त होगा।” यही कारण है कि आज भी काशी को मोक्ष की अंतिम सीढ़ी माना जाता है। यहां मणिकर्णिका घाट पर चिताएं कभी नहीं बुझतीं, क्योंकि यह सिर्फ मृत्यु नहीं, मोक्ष का द्वार है।












