कॉमरेड महेंद्र सिंह को शहीद हुए आज 21 वर्ष बीत चुके हैं। शहादत दिवस पर एक बार फिर खेत-खलिहानों से लेकर सड़कों पर महेंद्र सिंह की गूंज, अनुगूंज बनकर सुनाई दे रही है। लेकिन जनसंघर्ष की राजनीति का जो प्रयोग उन्होंने बगोदर की धरती से शुरू कर पूरे गिरिडीह जिले और कोडरमा लोकसभा क्षेत्र होकर पूरे झारखंड में विस्तार करने का सपना संजोया था, वह कहीं गंभीर ठहराव का शिकार तो नहीं हो गया.? यह सवाल आज झारखंड की राजनीति और विशेषकर वामपंथी राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के लिए जरूर अहम हो गया है।
एक समय भाकपा माले लिबरेशन की भूमिगत राजनीति से जुड़कर उसके मातहत एक छोटे जनवादी संगठन के के बैनर तले जनता और समाज के विभिन्न स्थानीय मुद्दों पर जिस कुशलता से उन्होंने नेतृत्व दिया, जल-जंगल-जमीन पर जनता के अधिकार की सड़कों की लड़ाई के रास्ते साहसिक और संघर्षशील जेल जीवन तथा जेल से बाहर आकर पुनः अनवरत संघर्ष के बूते 1990 में पहली बार विधानसभा में निर्वाचित सदस्य के रूप में कदम रखा, वह कोई मामूली काम नहीं, बल्कि उनकी जनसंघर्ष की राजनीति का ही एक नायाब उदाहरण था। बेशक उस रास्ते वे अंत तक टिके भी रहे।
निश्चित ही उनके साथ काम कर चुके साथियों, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, से लेकर उनकी अगुवाई में संघर्ष में शामिल रहे लोगों की भी एक बड़ी कतार के लिए महेंद्र सिंह आज भी जीवंत हैं, उन्हें भुला पाना मुश्किल है।
एकीकृत बिहार से लेकर झारखंड बनने के बाद भी एक तरफ जहां राजनीति के प्रस्थान बिंदु के रूप में जातिवाद की जड़ें एकदम से मजबूत थीं, उस दौर में भी उन्होंने अपने जीते-जी जातिवाद की राजनीति को किस तरह जनसंघर्ष की राजनीति के बूते निर्णायक रूप से शिकस्त दी, यह भी एक मिसाल है। शायद इसलिए समकालीन दौर में जातिवाद के सहारे राजनीति के कथित धुरंधरों की काबिलियत महेंद्र सिंह के सामने कहीं टिक नहीं पाती।
महेंद्र सिंह के दौर में ही भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के लगातार उभार के बीच देश और राज्य की मुख्य धारा की राजनीति UPA और NDA के रूप में बड़ी तेजी से दो धुरी में बंट चुकी थी। लेकिन सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ने और उसे रोकने के अघोषित/ घोषित लक्ष्य के बीच यह अनुभव भी लोगों के सामने खुलेआम हो रहा था कि, सत्ता में चाहे जो भी हों, अपनी बारी आते ही सत्ता संरक्षण में लूट के मामले में कोई पीछे नहीं! इस स्पष्टता के बावजूद दोनों को दरकिनार कर जनता के मुद्दों पर जनसंघर्ष की राजनीति को स्थापित कर लेना कोई मामूली चुनौती का काम नहीं था।
लेकिन महेंद्र सिंह जैसे लोगों को पता था, इंकलाब का रास्ता भी तो कठिन चुनौतियों को कबूल कर आगे बढ़ने से ही तय होता है। जैसे आजादी की लड़ाई में भगत सिंह ने भी देश में उस समय बढ़ रहे सांप्रदायिक उभार को जनता के मुद्दों पर संघर्ष के बूते ही निर्णायक रूप से परास्त करने को कारगर रास्ता बताया था। बस यही झलक महेंद्र सिंह की जनसंघर्ष की राजनीति में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी, जब उनके सघन जनसंघर्ष के इलाकों में सांप्रदायिक राजनीति के लिए सिर उठाना तक मुश्किल था। दूसरी ओर केंद्र में पहले से स्थापित पार्टी के कुशासन से पीड़ित जनता भी महेंद्र सिंह की राजनीति से मजबूती से जुड़े रहकर उन्हें हमेशा अग्रणी बनाए रही।
लेकिन आज की हकीकत शायद यही है कि, खासकर चुनाव में यूपीए और एनडीए दोनों से समान रूप से दूरी रखने वाले महेंद्र सिंह के बाद जनसंघर्ष की वह धारा मौजूदा गठबंधन की राजनीति में एक तरफ जाकर ऐसे मिल गई कि, आम जनता ही पेशोपेश में पड़ गई। यही नहीं, जिस राजनीतिक मजबूरी, विवशता या कथित राजनीतिक फायदे के नाम पर उनके वाहक गठबंधन में शामिल हुए, उसका नतीजा भी कम-से-कम चुनाव में तो सिफर ही रहा। महेंद्र सिंह के नेतृत्व में जिस गिरिडीह जिले में पार्टी को भरपूर विस्तार मिला, 1990 के बाद पहली बार वहां से कोई सीट नहीं निकल पाई। बल्कि गठबंधन के दलों द्वारा भी पार्टी को भी सिर्फ बगोदर की पार्टी मानकर ही ट्रीट किया गया।
महेंद्र सिंह के सानिध्य एवं देखरेख तथा राजकुमार यादव की अगुवाई में बगोदर के बाद सबसे मजबूत जनाधार के इलाके के रूप में स्थापित होकर बाबूलाल मरांडी जैसे शख्सियत को परास्त कर एक बार जीती गई धनवार जैसी विस सीट भी सहयोगी दलों द्वारा नहीं मिलने के बावजूद गठबंधन कबूल कर चुनाव परिणाम में सत्यानाश कर लेना आम लोगों की समझ से तो बाहर की चीज है। महेंद्र सिंह के दौर से ही जमुआ, गांडेय जैसी लगातार मजबूत हो रही सीटों को तो खैर खुद ही समर्पण कर उनकी विरासत को आगे ले जाने या पीछे धकेल देने का काम हुआ, इस पर तो अलग ही बहस है।
खैर, अब जबकि आम लोग भी खुली आंखों से यह देख रहे हैं कि, झारखंड के शासन में जब एनडीए या मौजूदा गठबंधन के रहने पर भी सत्ता संरक्षण में जारी लूट में कोई फर्क नहीं पड़ा, बेरोजगारी, विस्थापन, पलायन से लेकर सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार पहले से और बढ़ गया, तो महेंद्र सिंह की वह बात फिर से प्रासंगिक दिखाई देती है कि, वाकई ‘गठबंधन जनता के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में लूट और भागीदारी के लिए ही बनते हैं। अन्यथा, चुनाव के बाद जन मुद्दों पर संघर्ष के लिए कोई गठबंधन क्यों नहीं बनता.? इसलिए हमारा गठबंधन जनता के साथ है’












