बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस बार एक अनोखी चुनावी रणनीति अपनाई है। राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 101 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि छह जिलों—मधेपुरा, खगड़िया, शेखपुरा, शिवहर, जहानाबाद और रोहतास—में पार्टी ने एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा है। यानी इन जिलों के मतदाताओं को ईवीएम में भाजपा का चुनाव चिन्ह ‘कमल’ नहीं दिखेगा। यह फैसला पार्टी की गठबंधन रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जिसमें भाजपा ने अपने सहयोगी दलों—जदयू, लोजपा (आर), हम और आरएलएम—को ज्यादा मौके दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा का यह कदम न केवल गठबंधन में विश्वास बढ़ाने वाला है, बल्कि इससे पार्टी अपने संसाधनों को चुनिंदा सीटों पर केंद्रित कर रही है। वहीं, जिन जिलों में भाजपा ने एक-एक सीट पर ही उम्मीदवार उतारे हैं, वहां यह पार्टी की रणनीतिक चाल मानी जा रही है ताकि सहयोगी दलों के साथ तालमेल मजबूत रहे।
पिछले विधानसभा चुनाव (2020) में भी भाजपा ने कुछ जिलों में उम्मीदवार नहीं उतारे थे, लेकिन इस बार रोहतास को भी उस सूची में शामिल कर लिया गया है। पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह बिहार में गठबंधन राजनीति को प्राथमिकता दे रही है। जहां एक ओर भाजपा ने कई जिलों में खुद को पीछे किया है, वहीं पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण और पटना जैसे जिलों में उसने अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी है। पश्चिम चंपारण की 12 में से 8 सीटों पर भाजपा उम्मीदवार मैदान में हैं, जो इस जिले को पार्टी का गढ़ बनाता है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा इस रणनीति के ज़रिए अपने सहयोगियों को साथ लेकर एक सामूहिक चुनावी ताकत दिखाना चाहती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति आगामी 6 और 11 नवंबर को होने वाले मतदान में कितना असर दिखाती है।












