नई दिल्ली से आई ताज़ा सियासी कॉमेडी में एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन ने 452 वोट लेकर विपक्ष के सपनों की नाव को बीच मंझधार में डुबो दिया। विपक्ष की ओर से उतारे गए “न्याय के पुतले” सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी. सुदर्शन रेड्डी को सिर्फ 300 वोट ही मिले। अब सवाल ये है कि जब कांग्रेस के बड़े नेता जयराम रमेश खुद एक्स पर छाती ठोक कर बोले थे कि “हमारे 315 सांसदों ने 100% वोट डाला है”… तो 15 वोट आखिर गए कहां? क्या वो वोट किसी अदृश्य शक्ति ने चुरा लिए, या फिर इंडिया ब्लॉक के सांसद खुद ही ‘इंडिया छोड़ो, NDA जोड़ो’ मिशन पर निकल पड़े थे?
विपक्ष की ये ‘एकता’ चुनावी बैलट पेपर में ऐसी खो गई जैसे लॉकडाउन में रेल टिकट। जिस ब्लॉक को जनता एकजुटता का प्रतीक मान रही थी, वो वोटिंग बूथ में जाकर ही “ब्लॉक्ड” हो गया। बीजेपी ने इसे क्रॉस वोटिंग का सबूत बताया और विपक्ष ने इसे “गिनती की गलती” कहकर अपना दिल बहलाया। लेकिन जनता समझ चुकी है कि ये गलती नहीं, बल्कि राजनीतिक ‘गलतफहमी’ है। अगर यही हालत रही तो अगली बार विपक्ष को एकता का सबक समझाने के लिए किसी ट्यूशन मास्टर की ज़रूरत पड़ जाएगी।
सीपी राधाकृष्णन अब भारत के 15वें उपराष्ट्रपति बनेंगे और विपक्ष 15वीं बार सिर पकड़कर बैठक बुलाएगा। विपक्षी खेमे में इस हार को “लोकतंत्र की हत्या” का नाम देने की तैयारी चल रही है, जबकि सच्चाई ये है कि हत्या वोटिंग मशीन की नहीं, विपक्ष की एकजुटता की हुई है। सवाल ये भी उठ रहा है कि अगर इतना ही भरोसा नहीं था तो फिर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज को इस सियासी अखाड़े में क्यों उतारा गया? शायद इसलिए ताकि जनता कम से कम ये सोचे कि विपक्ष गंभीर है। खैर, जनता के सामने आज फिर वही पुराना नज़ारा – “विपक्ष एकजुट” कहता है, और नतीजे “विपक्ष विखंडित” साबित कर देते हैं।












