बिहार में जारी वोटर अधिकार यात्रा इस समय चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई है। 27 अगस्त को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन मुजफ्फरपुर में यात्रा में शामिल हुए। लेकिन उनकी मौजूदगी ने यात्रा की राजनीति को और गर्मा दिया। वजह यह है कि स्टालिन की पार्टी DMK के नेताओं के पुराने बयान बिहार के लोगों के खिलाफ रहे हैं। खासकर सांसद दयानिधि मारन ने कहा था कि “बिहार और यूपी से आने वाले लोग तमिलनाडु में टॉयलेट और सड़क साफ करने का काम करते हैं।” इस बयान के कारण लोगों में नाराजगी है और सवाल उठ रहा है कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ऐसे नेता को बिहार बुलाकर गलती तो नहीं कर दी।
यात्रा में शामिल आम लोगों और महागठबंधन समर्थकों ने भी अपनी नाराजगी जताई। कई लोगों ने कहा कि राहुल और तेजस्वी बिहार के लिए अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन “बिहारियों को गाली देने वाले” नेताओं को शामिल करना गलत है। स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि इससे बिहारियों का आत्मसम्मान ठेस पहुंचता है। एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि स्टालिन को बुलाना महागठबंधन का सेल्फ गोल साबित हो सकता है। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि बिहार की राजनीति में पहले से यह धारणा है कि DMK और स्टालिन बिहारियों और सनातन धर्म के खिलाफ हैं, इसलिए उनका आना नकारात्मक असर डाल सकता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस और RJD इस फैसले को सही ठहराते हुए कह रहे हैं कि स्टालिन INDIA ब्लॉक के नेता हैं और इस यात्रा में लगभग सभी बड़े नेताओं को शामिल किया जा रहा है। उनका दावा है कि स्टालिन की मौजूदगी से यह मैसेज देना था कि तमिलनाडु और वहां की सरकार बिहार के लोगों के साथ खड़ी है। वहीं, BJP ने इसे “बिहार का अपमान” बताया है और कहा है कि बिहारियों को गाली देने वाला नेता यहां वोट मांगने आया है। तमिलनाडु और बिहार दोनों जगह बीजेपी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है।
इसी दौरान प्रियंका गांधी भी यात्रा में शामिल हुईं। उनका आना मिथिला और महिला वोटरों को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। तीज के दिन उनकी मौजूदगी को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह देखा गया। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रियंका गांधी का देर से शामिल होना असर को सीमित कर सकता है। भीड़ जुटने के बावजूद क्या यह वोट में बदल पाएगी, यह कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि वोटर अधिकार यात्रा ने बिहार की राजनीति में नई हलचल जरूर मचा दी है।












