अमेरिका के 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान F-35 को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को एक और बड़ा झटका लगा है। भारत के बाद अब यूरोप के दो अहम देशों—स्पेन और स्विट्जरलैंड—ने इस विमान को खरीदने से साफ इनकार कर दिया है। स्पेन ने यूरोफाइटर टाइफून और फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) पर भरोसा जताया, जबकि स्विट्जरलैंड ने लगातार बढ़ती कीमत और अमेरिकी टैरिफ से नाराज़ होकर डील पर सवाल खड़े कर दिए। यह फैसला साफ करता है कि यूरोप अब अमेरिकी सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी रणनीतिक आज़ादी और रक्षा तकनीक पर ज्यादा ध्यान देना चाहता है।
स्पेन का यह कदम चौंकाने वाला है क्योंकि पहले माना जा रहा था कि वह अपनी नौसेना के लिए F-35B खरीदेगा, लेकिन अब उसने यूरोफाइटर और FCAS को तरजीह दी है। हालांकि इससे उसकी नौसैनिक ताकत अगले दस साल तक कुछ कमजोर रहेगी, मगर घरेलू उद्योग और यूरोपीय साझेदारी को इसका बड़ा फायदा मिलेगा। वहीं स्विट्जरलैंड ने 2022 में F-35A की खरीद के लिए जनमत संग्रह कराया था, लेकिन 2023 के बाद हालात बदले। अमेरिका ने कीमतें बढ़ाने और स्विस निर्यात पर टैरिफ लगाने की बात कही, जिससे बर्न की सरकार और नेताओं का भरोसा टूट गया। अब वहां सौदे को रद्द करने की मांग तेज हो गई है।
यह मामला सिर्फ कीमत या तकनीकी श्रेष्ठता का नहीं बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता का है। F-35 खरीदने का मतलब है—अमेरिका के अपग्रेड, डेटा और सॉफ़्टवेयर पर पूरी तरह निर्भर रहना। यही वजह है कि यूरोप धीरे-धीरे अपने विकल्प तलाश रहा है। भारत ने भी हाल ही में फ्रांस की कंपनी Safran के साथ मिलकर 120 KN इंजन बनाने की घोषणा की है, जो भविष्य के स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट्स को ताकत देगा। इससे भारत-फ्रांस की रणनीतिक साझेदारी मजबूत होगी और अमेरिका को एक और झटका मिलेगा।












