भारत तेजी से हरित और टिकाऊ ऊर्जा की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। भारतीय रेलवे ने 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है और सौर ऊर्जा इसमें अहम भूमिका निभाने वाली है। 2017 में दिल्ली से पहली सौर ऊर्जा संचालित डीईएमयू ट्रेन लॉन्च कर भारत ने इस क्षेत्र में अपनी शुरुआत की थी। इस ट्रेन ने पंखे और लाइट्स को ऊर्जा देकर 2.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने में योगदान दिया। हाल ही में बिहार के हावड़ा-नई दिल्ली रूट पर सौर ऊर्जा से ट्रेन चलाने की योजना बनी है और बीना (मध्य प्रदेश) में सोलर पावर प्लांट भी स्थापित किया गया है। बनारस लोकोमोटिव वर्क्स ने रेल ट्रैक पर सीधे सोलर पैनल लगाकर ऊर्जा बचत का एक अनूठा प्रयोग भी किया है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत इस क्षेत्र में अकेला नहीं है, बल्कि कई देश पहले ही इस राह पर कदम रख चुके हैं।
ऑस्ट्रेलिया ने 2017 में बायरन बे रेलरोड कंपनी के तहत दुनिया की पहली पूरी तरह सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेन शुरू की थी, जो न्यू साउथ वेल्स में 3 किलोमीटर के रूट पर चलती है। यह ट्रेन डीजल-मुक्त और शून्य उत्सर्जन वाली है। जर्मनी ने भी बैटरी स्टोरेज सिस्टम और सौर ऊर्जा के संयोजन से ट्रेनों को चालू किया, जिससे रात में भी संचालन संभव हो सका। जापान ने रेलवे स्टेशनों और मेट्रो नेटवर्क पर सौर पैनलों का उपयोग शुरू कर दिया है। वहीं चीन ने हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर सौर पैनल लगाए हैं, ताकि ट्रेनों को सीधे ऊर्जा दी जा सके। इन देशों की पहल यह दिखाती है कि भविष्य का ट्रांसपोर्टेशन अब पर्यावरण-हितैषी ऊर्जा पर ही टिकेगा।
भारत के सामने चुनौती यह है कि सौर ऊर्जा से चलने वाली ट्रेनों को सिर्फ प्रयोग तक सीमित न रखकर उन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जाए। रेलवे का विशाल नेटवर्क अगर सौर ऊर्जा पर आंशिक रूप से भी निर्भर हो जाए तो न सिर्फ प्रदूषण में कमी आएगी बल्कि देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भी एक बड़ा कदम बढ़ाएगा। भारत की इस पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की मांग और उत्पादन का संतुलन भी बेहतर हो सकता है। अब देखना यह होगा कि भारतीय रेलवे आने वाले वर्षों में इस लक्ष्य को कितनी तेजी और प्रभावशीलता से पूरा कर पाता है।












