भारत का राष्ट्रीय ध्वज आज हमारी एकता, स्वतंत्रता और गर्व का प्रतीक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसी तिरंगे को सलामी देने से साफ इनकार कर दिया था? यह घटना 1947 की है, जब अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने के बाद संविधान सभा ने पिंगली वेंकैया द्वारा बनाए गए तिरंगे के डिजाइन में बदलाव किया। 1931 में गांधी जी ने जिस तिरंगे को मंजूरी दी थी, उसमें चरखा प्रमुख प्रतीक था, लेकिन नए डिजाइन में चरखे की जगह सम्राट अशोक का धर्म चक्र शामिल कर दिया गया। यह फैसला कुछ गैर-कांग्रेसी सदस्यों के सुझाव पर लिया गया, जिनका मानना था कि चरखा कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक प्रतीक है और राष्ट्रीय ध्वज में इसे रखना उचित नहीं होगा।
गांधी जी इस बदलाव से बेहद दुखी हुए और लाहौर में रहते हुए उन्होंने अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से जताई। उन्होंने कहा—“मैं उस झंडे को सलामी नहीं दूंगा, जिसमें चरखा नहीं होगा।” उनके लिए चरखा सिर्फ सूत कातने का उपकरण नहीं, बल्कि गरीबों को रोजगार, आत्मनिर्भरता, सादगी और अमीर-गरीब के बीच एकता का प्रतीक था। चरखा गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन का हृदय था और वह मानते थे कि इसे हटाना भारतीय आत्मा से जुड़ी भावना को कमजोर करना है।
हालांकि, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने गांधी जी को समझाया कि अशोक चक्र भी शांति, धर्म और अहिंसा का प्रतीक है, जो भारत की प्राचीन संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है। आखिरकार, गांधी जी ने नए तिरंगे को स्वीकार कर लिया। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इस ध्वज को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया और 15 अगस्त 1947 को पहली बार स्वतंत्र भारत में यह तिरंगा लहराया। आज यह ध्वज न केवल हमारी आजादी का प्रतीक है, बल्कि उन मूल्यों की भी पहचान है, जिनके लिए हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया।












