हरियाणा की सुनारिया जेल में बंद डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर 40 दिन की पैरोल पर रिहा हो गया है। यह चौकाने वाली बात है कि बीते चार सालों में यह 14वीं बार है जब बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर मामलों में सजा काट रहे राम रहीम को फरलो या पैरोल दी गई है। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच वह सिरसा डेरा रवाना हुआ, जहां उनके अनुयायियों की संख्या लाखों में है। सवाल ये उठता है कि क्या कानून सभी के लिए एक समान है, या फिर कुछ लोगों के लिए विशेष नियम बन जाते हैं?
गुरमीत राम रहीम को साल 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के जुर्म में 20 साल की सजा सुनाई गई थी और 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में उम्रकैद मिली थी। इसके बावजूद, कभी डेरा के स्थापना दिवस तो कभी पारिवारिक कार्यक्रमों के नाम पर बार-बार उसे जेल से बाहर आने की इजाज़त दी जा रही है। इससे पहले अप्रैल 2024 में भी उसे 21 दिन की फरलो मिली थी। इन घटनाओं ने न सिर्फ पीड़ितों को न्याय से दूर किया है, बल्कि जनता के बीच न्याय प्रणाली की साख पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
पैरोल का यह सिलसिला तब और संदिग्ध हो जाता है जब चुनावों के ठीक पहले गुरमीत राम रहीम को छोड़ा जाता है। अक्टूबर 2024 में हरियाणा चुनाव से ठीक चार दिन पहले भी उसे 30 दिन की पैरोल मिली थी। यह भी दावा किया जाता है कि राम रहीम की अनुयायियों पर गहरी पकड़ के चलते वह पंजाब-हरियाणा की राजनीति में एक बड़ा ‘वोट बैंक’ बन चुका है। क्या बार-बार जेल से बाहर आने की वजह सजा की माफी है या राजनीतिक मजबूरी? यह सवाल अब सिर्फ अदालत या सरकार के लिए नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी गंभीर चिंतन का विषय है।












