झारखंड के दुमका जिले में शुक्रवार की सुबह वैसी नहीं थी जैसी आमतौर पर होती है। आसमान से बरसी आफत की बूंदों ने दो परिवारों की खुशियों को मलबे में तब्दील कर दिया। दो अलग-अलग गांवों में बारिश के कारण कच्चे मकानों के ढहने से दो ज़िंदगियों ने दम तोड़ दिया — एक मासूम बच्चा और एक 92 वर्षीय बुजुर्ग। और इनकी चीखें किसी चैनल की ब्रेकिंग नहीं बनी, सिवाय उन आंखों के जो अब भी नम हैं।
यह हादसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार किसी न किसी का ‘सब कुछ’ खत्म हो जाता है। दुमका जिले के हंसडीहा थाना क्षेत्र के बामनखेता गांव में सुबह-सुबह बारिश ने एक परिवार को तबाह कर दिया। 10 वर्षीय अमन कुमार और उसकी बड़ी बहन मासूम कुमारी (14) घर के अंदर थे, जब अचानक ईंट और गारे से बना कच्चा मकान ढह गया। अमन की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि मासूम बुरी तरह घायल हो गई। परिजन तो कुछ समझ ही नहीं पाए — नाश्ता बनता-बनता मातम में बदल गया।
हंसडीहा थाना प्रभारी प्रकाश सिंह ने बताया कि घटना के समय बच्चे घर के अंदर ही थे और सबकुछ सामान्य चल रहा था, तभी अचानक एक दीवार गिर गई। स्थानीय लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए मलबा हटाया और बच्चों को बाहर निकाला। मगर तब तक अमन इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। मासूम को देवघर रेफर किया गया है, जहां उसका इलाज चल रहा है। इस हादसे के बाद पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है, लेकिन सवाल यह भी है कि ऐसे हादसे आखिर कब तक होते रहेंगे और सरकार कब तक मुआवज़े के भरोसे लोगों को चुप कराती रहेगी?
दूसरी घटना सरैयाहाट थाना क्षेत्र के बेलुडीह गांव की है, जहां 92 वर्षीय तिल्ली मरीक की उस समय मौत हो गई जब उनका कच्चा मकान बारिश की वजह से ढह गया। सरैयाहाट थाना प्रभारी राजेंद्र यादव ने बताया कि तिल्ली मरीक की दीवार के नीचे दबकर मौत हो गई। सवाल सिर्फ दीवार का नहीं है, सवाल है उस तंत्र का जो ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित आवास तक नहीं पहुंचा पाया। लाड़ली बहन योजना हो या पीएम आवास — क्या ये सिर्फ स्लोगन हैं या ज़मीन पर भी कुछ बदला है?












