गिरिडीह ज़िले में जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़ी प्रक्रिया में बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया है। अब तक जमीन की रजिस्ट्री के लिए मुखिया द्वारा जारी वंशावली और अंचल कार्यालय की ओर से मिलने वाला एलपीसी (लैंड पोजिशन सर्टिफिकेट) मान्य होता था, लेकिन अब इन दोनों दस्तावेज़ों को रद्द कर दिया गया है। जिला निबंधन कार्यालय ने इस संबंध में नोटिस जारी कर दिया है और निबंधन कराने आने वाले लोगों को भी इसकी जानकारी दी जा रही है। इस नए आदेश के बाद जमीन के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और कानूनी मजबूती की उम्मीद की जा रही है।
इस कदम के पीछे प्रशासन की ओर से मिली शिकायतें हैं, जिसमें बताया गया कि मुखिया द्वारा वंशावली में मनमानी की जा रही थी। कई बार गलत या भ्रामक वंशावली तैयार की जाती थी जिससे असली मालिक को उसका अधिकार नहीं मिल पाता था। इसी तरह एलपीसी बनाने में अमीन और राजस्व कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। जिलाधिकारी रामनिवास यादव के समक्ष लगातार इन शिकायतों के आने के बाद उन्होंने राजस्व की जिलास्तरीय बैठक में इन दस्तावेजों पर रोक लगाने का निर्देश दिया। इसके बाद जिला अवर निबंधक बालेश्वर पटेल ने आदेश का पालन सुनिश्चित करते हुए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से इन दस्तावेजों को बाहर कर दिया।
इस फैसले को अधिवक्ताओं और आम जनता से व्यापक समर्थन मिला है। अधिवक्ताओं का कहना है कि मुखिया द्वारा जारी की जाने वाली वंशावली भ्रष्टाचार और पक्षपात का अड्डा बन गई थी। इसका लाभ कई बार भूमाफिया या गलत लोगों को मिलता था, जबकि वास्तविक ज़मीन मालिकों को न्याय नहीं मिल पाता था। वहीं, आम नागरिकों ने भी इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और ज़रूरतमंदों को अनावश्यक भागदौड़ से राहत मिलेगी।
अब जमीन के निबंधन के लिए जिन दस्तावेजों की आवश्यकता होगी, उनमें केवाला, खतियान, पंजी-2, शुद्धिपत्र जैसे प्रमाण शामिल हैं। ये दस्तावेज़ अधिक प्रमाणिक और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े होते हैं, जिससे जमीन की वैधता स्पष्ट होती है। जिला प्रशासन का यह निर्णय न केवल जमीन से जुड़ी पारदर्शिता को बढ़ाएगा बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त दलाली, धोखाधड़ी और भ्रामक दस्तावेजों के चलन पर भी अंकुश लगाएगा। गिरिडीह में यह पहल अब पूरे राज्य के लिए मिसाल बन सकती है।












