झारखंड की धरती पर एक बार फिर राजनीतिक समर शुरू हो गया है — लेकिन इस बार मुद्दा न कोई चुनाव है, न कोई दल-बदल। इस बार आवाज़ उठेगी उन लोगों के लिए, जिनके हाथों की लकीरें मिट चुकी हैं खेतों की कीचड़ में — जी हां, किसानों की बात हो रही है।
आज, 1 अगस्त से झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो चुका है, और इससे पहले ही सियासत की ज़मीन में हलचल है। क्या इस बार सिर्फ बहस होगी या किसानों की बातों का कोई असर भी पड़ेगा? यही सवाल है जो इस पूरे सत्र को खास बना देता है।
31 जुलाई को हुई सर्वदलीय बैठक ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि यह मानसून सत्र कुछ अलग होने वाला है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साफ तौर पर कहा — “इस बार किसानों की बात प्राथमिकता होगी।” और यह सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि एक संकल्प था — उन लाखों किसानों के लिए जिनकी भदई फसलें हाल की भीषण बारिश में तबाह हो चुकी हैं। मकई की फसलें नष्ट हो चुकी हैं, खेत की मिट्टी अब उम्मीदों के नहीं, नुकसान के सबूत दे रही है।
सत्र से एक दिन पहले हुई बैठक में खास बात ये रही कि भाजपा की ओर से पहली बार बतौर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी शामिल हुए, और उन्होंने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने की हामी भरी। यानी पक्ष-विपक्ष भले ही हमेशा आमने-सामने हों, लेकिन जब बात किसानों की हो, तो एकजुटता दिखी — ये अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है। साथ ही, संसदीय कार्य मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने भी इस पर चर्चा को अनिवार्य बताया।
JLKM विधायक जयराम महतो ने मांग की कि इस मुद्दे पर कम से कम दो घंटे की विशेष चर्चा होनी चाहिए। और खबर है कि 6 अगस्त को इस चर्चा पर कार्यमंत्रणा समिति की मुहर लग सकती है। यानी, अब सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि सदन में किसानों की स्थिति पर फोकस्ड बहस की तैयारी हो चुकी है। क्या यह बहस सिर्फ शब्दों में बहेगी या इससे कोई नीतिगत परिवर्तन भी निकलेगा — यह देखने वाली बात होगी।
मानसून सत्र का कार्यक्रम भले तय हो, लेकिन असली मुद्दा यही है कि किसानों की पीड़ा को कितनी जगह मिलेगी?
📅 1 अगस्त: दिवंगत विभूतियों को श्रद्धांजलि और राज्यपाल की सहमति प्राप्त विधेयक सदन में रखे जाएंगे।
📅 4 अगस्त: वित्तीय वर्ष 2025-26 का पहला अनुपूरक बजट प्रस्तुत किया जाएगा।
📅 5 अगस्त: प्रश्नकाल और बजट पर चर्चा।
📅 6 अगस्त: प्रश्नकाल, राजकीय विधेयक और किसानों पर विशेष चर्चा।
📅 7 अगस्त: प्रश्नकाल, गैर-सरकारी संकल्प और समापन।
हर तारीख महत्वपूर्ण है, लेकिन 6 अगस्त का दिन, किसानों की किस्मत लिखने वाला दिन हो सकता है — अगर सरकार और विपक्ष दोनों अपने वादों पर कायम रहें।












