लोकसभा में भाजपा सांसद और अभिनेता रवि किशन ने एक अनोखा मुद्दा उठाकर सबका ध्यान खींचा। शून्यकाल के दौरान उन्होंने मांग की कि देशभर के होटलों, रेस्टोरेंट्स और ढाबों में मिलने वाले भोजन की मात्रा और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार एक सख्त कानून बनाए। उन्होंने कहा कि “कभी समोसा छोटा, कभी बड़ा मिलता है”, जिससे ग्राहक भ्रमित होते हैं और उन्हें यह नहीं पता होता कि वे किस चीज के लिए कितना भुगतान कर रहे हैं।
गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में एक ही व्यंजन की कीमत और गुणवत्ता में भारी अंतर है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “कहीं समोसा 10 रुपए में मिलता है, तो कहीं 25 रुपए में, लेकिन कोई तय मानक नहीं है कि उसका आकार, वजन या गुणवत्ता कैसी होनी चाहिए।” इसी तरह दाल-तड़का की कीमत कहीं 100 रुपए, कहीं 120, तो किसी होटल में 1000 रुपए तक है। रवि किशन का कहना है कि यह आम उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है और सरकार को इसमें दखल देना चाहिए।
रवि किशन ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि मेन्यू कार्ड में सिर्फ कीमत नहीं, बल्कि भोजन की मात्रा और उसमें इस्तेमाल किए गए तेल या घी की जानकारी भी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि “हर ग्राहक का अधिकार है यह जानने का कि वह कितनी मात्रा के लिए कितना भुगतान कर रहा है और उसका खाना किस सामग्री से तैयार हुआ है।” इससे न केवल ग्राहकों को पारदर्शिता मिलेगी, बल्कि भोजन की बर्बादी भी कम होगी।
हालांकि भारत में FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) पहले से ही खाने की गुणवत्ता, लेबलिंग, पैकेजिंग और सुरक्षा के मानक तय करता है, लेकिन रवि किशन ने इस व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी व उपभोक्ता-हितैषी बनाने की बात कही। उन्होंने इस क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ठोस कदम उठाने की अपील की। इस प्रस्ताव को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है—कुछ लोग इसे आम उपभोक्ता के हक़ की आवाज़ बता रहे हैं, तो कुछ इसे “सांसदों को असल मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए” कहकर टाल रहे हैं। फिर भी, रवि किशन के इस तर्क ने संसद में एक अनदेखे लेकिन ज़रूरी मुद्दे को बहस के केंद्र में ला दिया है।












