महाराष्ट्र के चर्चित मालेगांव ब्लास्ट केस में करीब 17 साल बाद स्पेशल NIA कोर्ट का बड़ा फैसला आया। 2008 में हुए इस धमाके में छह लोगों की मौत और 101 से अधिक लोग घायल हुए थे। अब कोर्ट ने इस केस में आरोपी बनाई गईं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत सातों लोगों को बरी कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि जांच एजेंसियां आरोप साबित नहीं कर सकीं और आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया है। कोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि बम मोटरसाइकिल में रखा गया था या मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा के नाम थी। साथ ही कर्नल पुरोहित द्वारा RDX लाने के भी सबूत नहीं मिले।
इस फैसले ने सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच नई बहस छेड़ दी है। भाजपा नेताओं ने इस फैसले को सच्चाई की जीत बताया है। गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बयान की ओर इशारा करते हुए भाजपा ने कहा कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “आतंकवाद न कभी भगवा था, न है और न कभी होगा।” वहीं, भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने ‘हिंदू आतंकवाद’ की झूठी थ्योरी रचकर साजिश की। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी कहा कि हिंदू और आतंक दो अलग अवधारणाएं हैं, जिसे कांग्रेस ने गलत तरीके से जोड़ने की कोशिश की।
दूसरी ओर, कांग्रेस और I.N.D.I.A गठबंधन के नेताओं ने फैसले पर सवाल उठाए हैं और आतंकवाद को धर्म से न जोड़ने की बात दोहराई है। कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और हर धर्म शांति व प्रेम का प्रतीक है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने फैसले पर सीधा बयान देने से बचते हुए कहा कि जो मीडिया समझ रही है, वही वह भी समझते हैं। कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसी शब्दावली कांग्रेस ने नहीं, बल्कि तत्कालीन गृह सचिव आर.के. सिंह ने गढ़ी थी, जिन्हें बाद में भाजपा ने मंत्री बना लिया। उन्होंने कहा कि यह फैसला है, लेकिन न्याय नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम ने ‘धर्म बनाम आतंकवाद’ की बहस को फिर से हवा दी है। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कोर्ट से बरी होने के बाद कहा कि उनके 17 साल बर्बाद हुए और भगवा का अपमान करने वालों को भगवान सजा देंगे। इस पर कांग्रेस का तर्क है कि धर्म को आतंकवाद से जोड़ना गलत है। कुल मिलाकर, मालेगांव केस के बहाने देश की राजनीति में एक बार फिर भगवा आतंकवाद बनाम राष्ट्रवाद की बहस गहराती जा रही है, जिसमें न्याय, धर्म और राजनीति की परतें आपस में उलझती नजर आ रही हैं।












