झारखंड और बंगाल—दो राज्य, जिनके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में भले अंतर हो, पर दोनों ही आज बदलाव की एक समान दहलीज़ पर खड़े हैं। और इसी बदलाव की आहट लेकर देश की प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु आज से तीन दिवसीय दौरे पर इन दोनों राज्यों में पहुंच रही हैं। लेकिन सवाल यह है—क्या यह दौरा केवल एक औपचारिकता है, या इसके पीछे है कोई व्यापक उद्देश्य? क्या राष्ट्रपति का यह दौरा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की सड़ रही जड़ों को झकझोरने का कोई संकेत है?
31 जुलाई को राष्ट्रपति एम्स देवघर के पहले दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेंगी। यह वही एम्स है, जिसकी मांग वर्षों से हो रही थी और जिसे जनता की जिद और संघर्ष के बाद मंजूरी मिली। राष्ट्रपति का वहां पहुंचना केवल एक कार्यक्रम नहीं है, यह उस संकल्प का प्रतीक है कि देश का सबसे पिछड़ा क्षेत्र भी उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवा का हकदार है। इसके अगले दिन, यानी 1 अगस्त को राष्ट्रपति धनबाद स्थित आईआईटी (पूर्व में इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) के 45वें दीक्षांत समारोह में भाग लेंगी। यह वही संस्थान है जिसने भारत को कई खनन और ऊर्जा विशेषज्ञ दिए हैं। राष्ट्रपति का वहां जाना संकेत है कि कोयलांचल को अब शिक्षा के प्रकाश से रोशन किया जाना जरूरी है।
राष्ट्रपति का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब झारखंड और बंगाल दोनों ही राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मौलिक अधिकारों को लेकर सवालों के घेरे में हैं। देवघर का एम्स भले ही तैयार हो गया हो, लेकिन सुविधाओं की कमी और स्टाफ की अनुपलब्धता आम जनता को पूरी तरह लाभ नहीं दे पा रही। वहीं धनबाद की खनन बेल्ट में शिक्षा की चमक अब भी शहरी सीमाओं तक सीमित है। राष्ट्रपति मुर्मु खुद आदिवासी समुदाय से आती हैं और उनका इन इलाकों में दौरा यह उम्मीद जगाता है कि अब नीतियों का फोकस सिर्फ फाइलों तक नहीं रहेगा—जमीनी हकीकत बदलेगी।
सरकारों को, बल्कि देश की जनता को भी। सवाल यह है कि क्या ये दौरे केवल औपचारिक झांकियां हैं या इनमें छिपी है नवभारत के निर्माण की दृष्टि?से यही पूछता है—क्या आपको लगता है कि राष्ट्रपति के ऐसे दौरे विकास के इंजन को गति दे सकते हैं? या फिर ये भी बाकी रैलियों की तरह सिर्फ कैमरे के फ्लैश और भाषणों तक सिमटकर रह जाएंगे?












