झारखंड में शराब के नाम पर ऐसा खेल खेला गया, जिसमें सिस्टम की चुप्पी और भ्रष्टाचार की गूंज दोनों साफ सुनाई दी। एक तरफ सरकारी खजाने को 38 करोड़ का नुकसान, दूसरी तरफ फर्जी बैंक गारंटी के सहारे ठेके हथियाने वाली कंपनियां। लेकिन अब मामला सिर्फ घोटाले का नहीं, बल्कि न्याय के हथौड़े की दस्तक का है। झारखंड एसीबी ने अब उन सात आरोपियों की कुर्की की तैयारी शुरू कर दी है, जिनके गिरफ्तारी वारंट पहले ही जारी हो चुके हैं, लेकिन सब के सब अब तक फरार हैं। सवाल सिर्फ पैसा नहीं है, सवाल है कि कब तक यह सिस्टम ऐसे ही ठगों का शिकार होता रहेगा?
झारखंड में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच में सामने आया है कि दो प्लेसमेंट एजेंसियों ने फर्जी बैंक गारंटी के सहारे शराब दुकानों में मैनपावर सप्लाई का ठेका लिया, और इससे सरकार को 38 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। ये एजेंसियां थीं — गुजरात की मेसर्स विजन हॉस्पिटलिटी सर्विस एंड कंसल्टेंसी और महाराष्ट्र की मार्शन इनोवेटिव सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड। इन कंपनियों ने सिस्टम की कमजोरी का फायदा उठाकर सरकारी योजना को मुनाफे का खेल बना डाला।
गुजरात की एजेंसी से जुड़े विपिन जादव, भाई परमार, महेश शेडगे, परेश अभेसिंह ठाकोर और विक्रम सिंह ठाकोर, वहीं महाराष्ट्र की कंपनी से जगन तुकाराम देसाई, कमल जगन देसाई और शीतल जगन देसाई को एसीबी की विशेष अदालत ने पहले ही गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था। लेकिन सभी आरोपी फरार हैं और ACB अब इनकी कुर्की-जब्ती के लिए कोर्ट में आवेदन दाखिल करने जा रही है। यह मामला अब महज़ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षा बन चुका है — क्या भागे हुए आरोपियों को कानून की पकड़ में लाया जा सकेगा?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के पूर्व संयुक्त आयुक्त गजेंद्र सिंह भी इस घोटाले में आरोपी रहे हैं। हालांकि उन्हें जमानत मिल चुकी है और अब वे विभाग में वापस तो लौटे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कोई विभागीय कार्य नहीं सौंपा गया। सवाल ये भी उठता है कि इस पूरे घोटाले में सिर्फ प्लेसमेंट एजेंसियां ही दोषी हैं या फिर सिस्टम का भी कोई हिस्सा इस साज़िश में शामिल था? क्या सिर्फ एजेंसी मालिकों पर कार्रवाई पर्याप्त होगी या विभाग के भीतर बैठी ‘मूक स्वीकृति’ को भी सवालों के घेरे में लाया जाएगा?












