बिहार की राजनीति एक बार फिर गरमाई हुई है। क्या RJD चुनाव जीतने के लिए आखिरी दांव खेल चुकी है? क्या लालू प्रसाद यादव की नई टीम जीत की गारंटी साबित होगी या सिर्फ एक रणनीतिक शोर? बिहार में अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रीय जनता दल ने अपनी सियासी बिसात पर नए मोहरे बिछा दिए हैं। इस नई चाल के पीछे एक पूरी रणनीति छुपी है—सामाजिक समीकरण का गणित, अनुभव और युवा जोश का मेल। लेकिन सवाल उठता है—क्या सिर्फ नाम बदलने से नतीजे भी बदलेंगे?
5 जुलाई को लगातार 13वीं बार RJD के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने लालू यादव ने अपनी नई टीम का एलान कर दिया। यह महज़ नियुक्तियाँ नहीं, बल्कि एक सियासी संकेत है—RJD अब पुराने ढर्रे से आगे बढ़ना चाहती है। इस बार लालू ने युवा जोश और अनुभवी नेताओं का ऐसा मिश्रण तैयार किया है जो पार्टी को ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा के गलियारों तक मजबूत बना सके। खास बात ये है कि हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है, जिससे साफ जाहिर है कि यह संगठनात्मक बदलाव सिर्फ चुनावी स्टंट नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सामाजिक इंजीनियरिंग है।
लालू यादव की घोषित नई टीम में जिन 6 प्रमुख प्रकोष्ठों के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, वे कुछ इस प्रकार हैं:
महिला प्रकोष्ठ: पूर्व केंद्रीय मंत्री कांति सिंह
युवा प्रकोष्ठ: सांसद अभय कुशवाहा
अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ: पूर्व केंद्रीय मंत्री अली अशरफ फातमी
अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ: पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम
किसान प्रकोष्ठ: सांसद सुधाकर सिंह
छात्र प्रकोष्ठ: प्रोफेसर नवल किशोर
यह सूची सिर्फ नामों की नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों की भी है—महिला, दलित, मुस्लिम, छात्र और किसान वर्ग को साथ लेकर चलने का प्रयास। क्या यह वो समीकरण है जो NDA को बिहार में टक्कर दे सकता है?
RJD ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री पद के चेहरे होंगे। वे न केवल विपक्ष के नेता हैं, बल्कि महागठबंधन कोऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। यानी अब कोई भी बड़ा फैसला उनके बिना नहीं होगा। पार्टी का फोकस अब सिर्फ संगठनात्मक बदलाव पर नहीं, बल्कि एक स्पष्ट नेतृत्व मॉडल पेश करने पर है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में क्या युवा मतदाताओं को साधा जा सकेगा? क्या यह नया नेतृत्व नीतीश कुमार और BJP के सामने एक ठोस विकल्प बन पाएगा? जवाब तलाशना अभी बाकी है।












