क्या भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अब उस मोड़ पर पहुंच चुके हैं, जहां से सिर्फ टकराव ही बाकी है? क्या यह सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि चेतावनी है? पहलगाम की वादियों में बहा निर्दोषों का खून अब सिर्फ आँसुओं से नहीं, एक निर्णायक नीतिगत परिवर्तन से धोया जाएगा। और इस बार सरकार ने बातों से नहीं, सीधे फैसलों से वार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक ने एक के बाद एक ऐसे कदम उठाए हैं, जो ना केवल पाकिस्तान बल्कि दुनिया के सामने भारत की नई नीति का ऐलान हैं—”अब कोई नरमी नहीं, सीधी कार्रवाई।”
पहलगाम आतंकी हमले के बाद देश की राजधानी दिल्ली में राजनीतिक और सुरक्षा गलियारों में हलचल तेज हो गई। प्रधानमंत्री मोदी ने तत्काल कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक बुलाई, जिसमें रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल शामिल हुए। लगभग ढाई घंटे चली इस बैठक में एक बात साफ हो गई—भारत अब सहनशीलता नहीं, प्रतिरोध की नीति अपनाएगा। पांच बड़े और साहसिक फैसले इस बात के गवाह हैं कि मोदी सरकार अब आतंक को राजनीतिक और कूटनीतिक जवाब देने में देर नहीं करेगी।
पहला बड़ा फैसला, सिंधु जल समझौते पर रोक। 1960 में बना यह ऐतिहासिक जल समझौता अब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। जब तक पाकिस्तान आतंक के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाता, भारत पानी नहीं बहाएगा—नदी भी अब राष्ट्रहित में बहाई जाएगी। दूसरा बड़ा निर्णय—भारत-पाक अटारी बॉर्डर को बंद करने का। हालांकि पाकिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों को 1 मई 2025 तक की मोहलत दी गई है, पर इसके बाद सीमाएं पूरी तरह बंद रहेंगी। यह कदम न केवल सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है, बल्कि यह बताता है कि अब भारत भावनाओं के बजाय सुरक्षा प्राथमिकताओं पर काम करेगा।
सरकार ने तीसरा बड़ा फैसला पाकिस्तान के नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर लिया है। अब कोई भी पाकिस्तानी नागरिक सार्क वीजा स्कीम के तहत भारत में प्रवेश नहीं कर सकेगा। पहले से जारी सभी वीजा रद्द कर दिए गए हैं, और जो नागरिक पहले से भारत में हैं, उन्हें 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने के आदेश दिए गए हैं। यह कदम न केवल देश की सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि साफ करता है कि अब आतंक के खिलाफ नीति सिर्फ सीमित बयानों में नहीं रहेगी, बल्कि जमीन पर भी लागू होगी।
दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास के सैन्य और कूटनीतिक स्टाफ को देश छोड़ने को कहा गया है, और भारत ने भी इस्लामाबाद से अपने अधिकारियों को वापस बुला लिया है। साथ ही, दोनों देशों के दूतावासों में स्टाफ घटाकर 30 तक सीमित कर दिया गया है, जो पहले 55 हुआ करते थे। इसका मतलब साफ है—अब दोनों देशों के बीच संवाद केवल जरूरत भर का होगा, दोस्ताना या औपचारिक संबंधों का युग फिलहाल थम चुका है। यह मोदी सरकार की स्पष्ट और साहसी कूटनीति का प्रतीक है, जो कहती है—“आतंक को सहन नहीं, कुचलेंगे।” यह बदलाव सिर्फ एक देश को नहीं, पूरी दुनिया को संदेश देता है कि भारत अब कार्रवाई में विश्वास रखता है, इंतजार में नहीं।












